परिचय :- डॉ० कपिलदेव द्विवेदी का जन्म/एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। आपके बाबा श्री छेदीलाल जी प्रसिद्ध धनी-मानी उद्योगपति थे। आपके पिता श्री बलरामदास जी और माता श्रीमती वसुमती देवी थीं। आपके पिता एक त्यागी, तपस्वी समाजसेवी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देशसेवा में लगाया। आपके पिताजी और माताजी स्वतंत्रता संग्राम-सेनानी थे। तीन बार कांग्रेस के आन्दोलन में जेल गए। डॉ० द्विवेदी जी का जन्म’ ६ दिसम्बर १९१८ को हुआ। आपके पिताजी ने आपके जन्म से पहले दो निर्णय लिए थे कि बालक का नाम कपिलमुनि के नाम पर कपिलदेव रखा जाएगा और उसे शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाएगा। पूर्व निर्णय के अनुसार बालक का नाम कपिलदेव रखा गया और कक्षा ४ तक अध्ययन के बाद गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर हरिद्वार में संस्कृत की उच्च शिक्षा के लिए भेजा गया।

शिक्षा दीक्षा :- १० वर्ष की आयु में डॉ० द्विवेदी को गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर में प्रविष्ट कराया गया। आपने १९२८ से १९३९ तक गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की। गुरुकुल में रहते हुए आपने शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की और आपको गुरुकुल की उपाधि विद्याभास्कर प्राप्त हुई। सभी परीक्षाओं में आप प्रम श्रेणी के साथ प्रथम स्थान पर रहे। यहाँ रहते हुए आपने यजुर्वेद और सामवेद दो वेद कंठस्थ किए और उसके परिणामस्वरूप गुरुकुल से द्विवेदी की उपाधि प्रदान की गई। आपने गुरुकुल में रहते हुए बंगला और उर्दू भाषा भी सीखी। साथ ही आपने भारतीय व्यायाम लाठी, तलवार, युयुत्सु और पिरामिड बिल्डिंग आदि की शिक्षा भी प्राप्त की। गुरुकुल में रहते हुए आप १९३९ में स्वतंत्रता संग्राम के अंग हैदराबाद आर्य-सत्याग्रह आन्दोलन में ६ मास कारावास में रहे। आप भी अपने पिता के तुल्य स्वतंत्रता सेनानी थे।

शैक्षणिक योग्यता :- आपने पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से १९४६ में प्रथम श्रेणं में प्रथम रहते हुए एम०ए० संस्कृत की परीक्षा उत्तीर्ण की। वहीं से एम०ओ०एल० की उपाधि भी आपको प्राप्त हुई। आपके छोटे भाई सत्यदेव भी लहौर से १९४७ में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास किया। तदनन्तर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में डॉ० बाबूराम सक्सेना के निर्देशन में भाषा विज्ञान विषय में १९४९ में डी०फिल्० की उपाधि प्राप्त की। अपने संस्कृत यूनिवर्सिटी वाराणसी से व्याकरण विषय में आचार्य की उपाधि प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम रहते हुए उत्तीर्ण की। आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आचार्य डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में प्रथम श्रेणी में एम०ए० (हिन्दी) की परीक्षा भी उत्तीर्ण की । आपने अनेक भाषाओं में विशेष यो यता प्राप्त की। प्रयाग विश्वविद्यालय से आपने जर्मन, फ्रेंच, रूसी, चीनी आदि भाषाओं में प्रोफिसिएन्सी परीक्षा उत्तीर्ण की है। इसके अतिरिक्त पारित, प्राकृत, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी और उर्दू में भी आपने विशेष दक्षता प्राप्त की है।

शैक्षणिक सेवाएँ :- आप १९४० से १९४४ तक नारायण स्वामी हाईस्कूल रामगढ़ नैनीताल में संस्कृत-शिक्षक रहे। तदनन्तर १९५० से १९५४ तक सेंट एन्ड्यूज कालेज गोरखपुर में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे। नवम्बर १९५४ से मार्च १९६५ तक देवसिंह बिष्ट स्नातकोत्तर महाविद्यालय नैनीताल में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे। मार्च १९६५ से जुलाई १९७७ तक काशी-नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर भदोही में संस्कृत विभागाध्यक्ष, उपाचार्य एवं प्राचार्य पदों पर रहे। अगस्त १९७७ से जून १९७८ तक राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय गोपेश्वर (चमोली) में प्राचार्य रहे। वहाँ से ३० जून १९७८ को राजकीय सेवा से अवकाश प्राप्त किया। तदनन्तर १९८० से १९९२ तक गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर (हरिद्वार) में कुलपति रहे। आप १९७९ से २०११ तक विश्वभारती अनुसंधान परिषद् ज्ञानपुर के निदेशक रहे।

पारिवारिक जीवन :- डॉ० द्विवेदी का जीवन अत्यन्त संघर्षपूर्ण रहा है। आपने जीवन भर संघर्ष किया है। आपका विवाह १९५३ में चन्दौसी निवासी श्री रामशरणदास की पुत्री ओमशान्ति से हुआ। आपके पाँच पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं। प्रायः सभी एम०ए०एम०एस-सी०, पीएच० डी० हैं। आप उच्चकोटि के साधक रहे। १९४२ में योग की शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोग आपके दैनिक जीवन का अंग रहा। आप नियमित रूप से योगाभ्यास करते रहे। आपने अपने अनुभव साधना और सिद्धि में दिए हैं। आपकी पत्नी का निधन २८ दिसम्बर १९७३ को प्रातः ५ बजे हुआ। आपने माँ और पिता दोनों के दायित्व का निर्वहन करते हुए परिवार को संरक्षण दिया। आपने ९३ वर्ष की अवस्था में २८ अगस्त २०११ को १ बजे अपराह्न में इस भौतिक शरीर का परित्याग किया।

ग्रन्थ-लेखन :- डॉ० द्विवेदी की प्रथम पुस्तक ‘संस्कृतरत्नावली’ यू०पी० बोर्ड की हाईस्कूल परीक्षा में संस्कृत की पाठ्य पुस्तक के रूप में निर्धारित हुई। इससे आपको पर्याप्त यश मिला। इसके पश्चात् आपने रचनानुवाद-कौमुदी १९५२ में लिखी। निरन्तर लेखन साधनारत रहते हुए आपने ७५ से अधिक ग्रन्थों का प्रणयन ९२ वर्ष की अवस्था तक किया।

विशिष्ट सेवा :- डॉ० द्विवेदी की गणना विश्व के प्रमुख प्राच्यविद्याविदों, भाषाविदों और वेदविदों में की जाती है। आप संस्कृत भाषा के सरलीकरण पद्धति के उन्नायक एवं प्रवर्तक माने जाते हैं। संस्कत को लोकप्रिय बनाने में आपका महत्त्वपूर्ण योगदान है। वेदों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए आपने वेदामृतम् ग्रन्थमाला के ४० भागों का प्रकाशन किया है।

विदेश यात्रा :- आपने ५ बार विदेश यात्राएं की । आपने भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए १९७६, १९८९, १९९०, १९९१ और १९९३ में विदेश यात्रा की है। इनमें ये देश सम्मिलित हैं-अमेरिका (उत्तरी और दक्षिणी), कनाडा, इंग्लैण्ड, जर्मनी, हालैण्ड, फ्रांस, इटली, स्विट्जरलैण्ड, सूरीनाम, गुयाना, मारीशस, केनिया, तंजानिया और सिंगापुर।

सम्मान, अभिनन्दन एवं पुरस्कार

१. संस्कृत साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए आपको भारत सरकार ने सन् १९९१ में ‘पद्मश्री’ अलंकरण से विभूषित किया।

२. भारतीय विद्याभवन बंगलौर द्वारा गुरु गंगेश्वरानन्द वेदरत्न पुरस्कार २००५।

३. दिल्ली संस्कृत अकादमी द्वारा महर्षि वाल्मीकि सम्मान २०१०-२०११ (डेढ़ लाख रु०) से २४.८.२०११ को सम्मानित।

४. भारत सरकार द्वारा १५ अगस्त २०१० को संस्कृत भाषा की सेवा के लिए राष्ट्रपति सम्मान’।

५. “विशिष्ट पुरस्कार’ उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (१९९२) द्वारा (२५०००रु०) संस्कृत साहित्य की विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया गया।

६. वेद-पंडित’ पुरस्कार अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन द्वारा १९९५।

७. “पण्डित राज जगन्नाथ संस्कृत पद्य रचना पुरस्कार’ दिल्ली संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत मौलिक काव्य रचना “आत्मविज्ञानम् (संस्कृत महाकाव्य) पर १९९७ में।

८. “बीरबल साहनी पुरस्कार’ १९९३ में “वेदों में आयुर्वेद” पर (११,००० रु०) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा।

९. के०एन० भाल पुरस्कार वर्ष २००० में ‘वेदों में विज्ञान ग्रन्थ पर (२०,००० रु०) उ०प्र० हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा।

१०. हजारीप्रसाद द्विवेदी अनुशंसा पुरस्कार १९८८, अथर्ववेद का सांस्कृतिक अध्ययन, ग्रन्थ पर उ०प्र० हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा।

११. वेद वेदाङ्ग पुरस्कार (२५०००रु०), आर्य समाज सान्ताक्रुज, मुम्बई (२०००)।

१२. आचार्य गोवर्धन शास्त्री पुरस्कार (१९९१ ) गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार द्वारा।

१३. संस्कृत वर्ष सम्मान पत्र, सम्पूर्णानन्द सं० वि०वि०, वाराणसी (२०००)।

१४. राष्ट्रीय हिन्दी सेवा सहस्राब्दि सम्मान (२३.०९.२०००) सहस्राब्दि विश्व हिन्दी सम्मेलन नई दिल्ली द्वारा।

१५. वैदिक विद्वान् पुरस्कार (१९९५) सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली।

१६. विद्यामार्तण्ड स्वामी धर्मानन्द स्मृति पुरस्कार (५०००रु०) १९९८, आर्य वानप्रस्थ एवं विरक्त आश्रम ज्वालापुर हरिद्वार।

१७. ‘Certificate of Honour International Conference on History of Mathematics’ (गुरुकुल कांगड़ी वि०वि० हरिद्वार) (१६ दिसम्बर १९९९)।

१८. ‘ज्ञानगिरि’ सम्मान प्रशासनिक अध्ययन संस्थान मुजफ्फरपुर (१९.०२.१९९१)।

१९. रत्नप्रकाश मेमोरियल ट्रस्ट गोरखपुर द्वारा ‘रत्नप्रकाश सम्मान २००६ से।

२०. ‘आर्य विभूषण पुरस्कार २००८’ (रु० बीस हजार) राव हरिश्चन्द्र आर्य चेरिटेबुल टूट नागपुर द्वारा।

२१. ‘Lifetime Achievement Award’ by All India Carpet Manufacturers Association, Bhadohi. March 2011
सूरीनाम के राष्ट्रपति ने १९९० में और मारीशस के राष्ट्रपति ने १९९१ में आपका विशेष सम्मान किया था। विदेशों में लन्दन यूनिवर्सिटी के प्राच्य विभाग ने १९८९ में, फ्रैंकफर्ट यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग ने १९८९ में, ईस्ट-वेस्ट यूनिटी यूनिवर्सिटी न्यूयार्क ने १९९० में, टोरंटो युनिवर्सिटी संस्कृत विभाग ने १९९० में, सूरीनाम यूनिवर्सिटी के मेडिकल कालेज ने १९९० में, गुयाना यूनिवर्सिटी के साइंस विभाग ने १९९० चें आपका सार्वजनिक अभिनन्दन किया । इसके अतिरिक्त आ शताब्दी समारोह, नई दिल्ली द्वारा १९७५, महर्षि दयानन्द निर्वाण शताब्दी अजमेर द्वारा १९८३, आर्यसमाज शताब्दी समारोह कलकत्ता द्वारा १९८५ में सम्मानित किया गया । विन्ध्य गौरव सम्मान १९९९, विन्ध्य महोत्सव समिति द्वारा प्रदान किया गया।

आपकी इन रचनाओं पर उत्तर प्रदेश एवं केन्द्रीय सरकार से पुरस्कार प्राप्त हुए हैं :- १. अर्थविज्ञान और व्याकरण- दर्शन १९५२, २. संस्कृत व्याकरण १९७२, ३. संस्कृत निबन्धशतकम् १९७७, ४. राष्ट्रगीतांजलिः १९८१,५. भक्ति-कुसुमाञ्जलिः १९९०, ६. अथर्ववेद का सांस्कृतिक अध्ययन १९९१,७. वेदों में आयुर्वेद १९९५,८. आत्मविज्ञानम् १९९५, ९. वेदों में राजनीतिशास्त्र- १९९७, १०. वेदों में विज्ञान २००४

आपको तीन अभिनन्दन ग्रन्थ समर्पित किए गए-१. डॉ० कपिलदेव द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ (८१वें जन्मदिवस पर), २. अभिनन्दन भारती एवं संस्कृत वाङ्मय में पर्यावरण चेतना (८६वें जन्मदिवस पर), ३. सारस्वत साधना के मनीषी एवं संस्कृत वाङमय में वाङ्मय में। विज्ञान (९१वें जन्मदिवस पर)।

Close Menu
×
×

Cart